नफरती भाषण और कानून: किसके लिए जेल, किसके लिए वार्निंग? Article

 

Times Watch देश दुनिया

रखे हर खबर पर पैनी नजर | खबर को सच की छलनी में छान कर झूठ को कूड़े में डाल कर आप तक लाते हैं।
दम तो तोड़ते सच को बचाने की कोशिश।

प्रकाशित:

📰
Times Watch: 'देश दुनिया, रखे हर खबर पर पैनी नजर…'


नफरती भाषण और कानून: किसके लिए जेल, किसके लिए वार्निंग?


📌 संक्षेप

भारत में कानून का असमान इस्तेमाल साफ दिखाई देता है।

  • उमर खालिद, शारजील इमाम, खालिद सैफी और कई मुस्लिम छात्र-छात्राओं को UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत वर्षों से जेल में रखा गया है।
  • दूसरी ओर, यति नरसिंहानंदप्रवेश वर्मासुधर्शन टीवी के सुरेश चव्हाणके, और कई हिंदुत्ववादी नेताओं ने खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले भाषण दिए — मगर उन्हें सिर्फ वार्निंग या मामूली केस देकर छोड़ दिया गया।

⚖️ दो लिस्टों में फर्क

🟥 लिस्ट A (सख़्त कार्रवाई, लंबी जेलें – ज़्यादातर सरकार/भाजपा विरोधी)

  • उमर खालिद – UAPA, दिल्ली दंगे साजिश केस, जमानत नाकाम।
  • शारजील इमाम – "कट ऑफ असम" भाषण, UAPA, 2020 से जेल।
  • खालिद सैफी – CAA विरोध प्रदर्शनों में भूमिका, लंबे समय से जेल।
  • गुलफिशा फातिमा (सफूरा जरगर, इशरत जहां जैसी छात्राएं) – UAPA और साजिश केस, महीनों/सालों जेल।

👉 इनमें से कई निर्दोष साबित भी हो सकते हैं, मगर जेल पहले, ट्रायल बाद में।

“एक तरफ जेल में छात्र नेता, दूसरी तरफ मंच पर नफरती भाषण देने वाले नेता।”

🟩 लिस्ट B (भड़काऊ बयान, मगर ढीली कार्रवाई – ज़्यादातर सत्ता/हिंदुत्व से जुड़े)

  • यति नरसिंहानंद – "मुसलमानों के नरसंहार" की अपील, कई बार FIR, मगर जमानत तुरंत और अक्सर सिर्फ चेतावनी।
  • सुरेश चव्हाणके (सुदर्शन टीवी) – “UPSC जिहाद” और सांप्रदायिक ज़हर, मामूली केस।
  • प्रवेश वर्मा (BJP सांसद) – “शाहीन बाग़ वाले आपके घर घुस आएंगे” बयान, सिर्फ चुनाव आयोग की फटकार।
  • अनुराग ठाकुर (केंद्रीय मंत्री) – “देश के गद्दारों को गोली मारो…” नारा, केवल चुनाव आयोग द्वारा 72 घंटे का बैन।
  • योगी आदित्यनाथ – चुनावी रैलियों में लगातार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले बयान, कभी सख्त कार्रवाई नहीं।
  • कपिल मिश्रा – दिल्ली दंगों से पहले का भड़काऊ भाषण, कोई गंभीर कार्रवाई नहीं।

🔎 तस्वीर साफ

  • विपक्षी या अल्पसंख्यक कार्यकर्ता – जेल, UAPA, लंबी कैद।
  • सत्ताधारी या हिंदुत्ववादी चेहरें – मामूली FIR, जमानत, चेतावनी या सिर्फ चुनाव आयोग की डाँट।
  • यति नरसिंहानंद इसका सबसे बड़ा उदाहरण: बार-बार जहर उगलने के बाद भी स्वतंत्र घूम रहे हैं

🎯 निष्कर्ष

भारत में नफरती भाषण पर कार्रवाई भाषण की गंभीरता पर नहीं, बल्कि बोलने वाले की पहचान और राजनीतिक जुड़ाव पर निर्भर है।

  • सरकार-विरोधी: जेल, लंबी सज़ा, जिंदगी बर्बाद।
  • सत्ता-समर्थक: चेतावनी, तात्कालिक गिरफ्तारी, फिर छूट।

Post a Comment

Previous Post Next Post