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दम तो तोड़ते सच को बचाने की कोशिश।
📰 Times Watch: देश दुनिया, रखे हर खबर पर पैनी नजर…- दम तोड़ते सच को बचाने की कोशिश,
05 September 2025
नई दिल्ली
✒️ मज़लूम फिलिस्तीन की कहानी: सलाउद्दीन अयूबी से सुल्तान अब्दुल हमीद और आज तक
वोट चोरी' (vote chori/voter fraud) के विषय में हाल ही में कई महत्वपूर्ण अपडेट सामने आए हैं। यहाँ प्रमुख बिंदुओं का सार प्रस्तुत है:
1. सलाउद्दीन अयूबी और येरूशलम की फतह (12वीं सदी)
क्रूसेड्स यानी यूरोप से आए ईसाई फ़ौजों ने 1099 में येरूशलम पर कब्ज़ा कर लिया।
मुसलमानों का खून बहा, मस्जिद-ए-अक्सा अपमानित हुई।
लेकिन 1187 में सलाउद्दीन अयूबी ने अपनी बहादुरी और रणनीति से येरूशलम को आज़ाद कराया।
उन्होंने दुश्मनों के साथ भी इंसाफ़ किया, कत्लेआम नहीं होने दिया।
यही दौर फिलिस्तीन में मुसलमानों की इज़्ज़त और इत्तेहाद का सुनहरा अध्याय था।
2. उस्मानी सल्तनत का दौर (1517–1917)
16वीं सदी से उस्मानी खलीफ़ा ने फिलिस्तीन को अपनी हुकूमत में शामिल कर लिया।
चार सौ साल तक वहाँ अमन, मज़हबी आज़ादी और इंसाफ़ रहा।
यहूदियों और ईसाइयों को भी वहां रहने की जगह मिली, लेकिन ज़ायोनिस्ट आंदोलन धीरे-धीरे उभरने लगा।
3. सुल्तान अब्दुल हमीद II और ज़ायोनिस्ट पेशकश (19वीं सदी)
1890s में थिओडोर हर्ज़ल नाम के यहूदी लीडर ने यहूदियों के लिए फिलिस्तीन में एक "राष्ट्र" बनाने का ख्वाब दिखाया।
हर्ज़ल ने सुल्तान अब्दुल हमीद II को पेशकश दी:
“अगर आप फिलिस्तीन हमें दे दें, तो हम आपकी कर्ज़ों में डूबी सल्तनत को सोने-चाँदी से भर देंगे।”
लेकिन सुल्तान अब्दुल हमीद II ने साफ़ कहा:
👉 “फिलिस्तीन मेरी नहीं, उम्मत-ए-मुस्लिमा की अमानत है।
जब तक मैं ज़िंदा हूँ, एक इंच जमीन भी नहीं दूँगा।”
ये इंकार, ज़ायोनिस्टों और यूरोपीय ताक़तों के गले की हड्डी बन गया।
अब्दुल हमीद के खिलाफ साज़िशें रची गईं, अख़बारों में झूठा प्रोपेगेंडा किया गया, और 1909 में उन्हें तख़्त से हटा दिया गया।
4. ब्रिटिश मैंडेट और बालफोर डिक्लेरेशन (1917)
पहली विश्वयुद्ध में उस्मानी सल्तनत टूट गई।
ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर कब्ज़ा कर लिया।
2 नवंबर 1917 को ब्रिटिश विदेश मंत्री बालफोर ने एलान किया कि:
👉 “हम फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक घर बनाएंगे।”
यहीं से इज़राइल बनाने की ज़मीन तैयार होने लगी।
5. 1948 – नक़बा (महान त्रासदी)
दूसरी विश्वयुद्ध के बाद लाखों यहूदियों को यूरोप से फिलिस्तीन लाया गया।
संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को यहूदियों और अरबों में बाँटने की योजना बनाई।
अरब देशों ने इसे ठुकरा दिया।
1948 में यहूदियों ने अचानक इज़राइल का ऐलान कर दिया।
अरब देशों ने जंग लड़ी, लेकिन हार गए।
👉 7 लाख से ज़्यादा फिलिस्तीनी बेघर हो गए।
👉 उनकी बस्तियाँ उजाड़ दी गईं।
👉 इस त्रासदी को आज भी नक़बा (Catastrophe) कहा जाता है।
6. 1967 और 1973 की जंगें
1967 की छह दिन की जंग में इज़राइल ने:
- वेस्ट बैंक,
- गाज़ा,
- गोलान हाइट्स
कब्ज़े में ले लिया।
1973 की जंग में अरब देशों ने कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे।
फिलिस्तीनियों के पास सिर्फ मज़हबी जज़्बा और पत्थर बचे।
7. इंतिफ़ादा और हमास का उदय (1987 के बाद)
1987 में फिलिस्तीनियों ने सड़कों पर इंतिफ़ादा (विद्रोह) शुरू किया।
बच्चे पत्थरों से टैंकों का मुकाबला करते दिखे।
इसी दौर में हमास नाम की तहरीक उभरी, जिसने इज़राइल के खिलाफ हथियार उठाए।
दुनिया ने इसे “आतंकी” करार दिया, लेकिन फिलिस्तीनी इसे मुक़ावमत (Resistance) मानते हैं।
8. आज का फिलिस्तीन (2025)
आज फिलिस्तीन:
- गाज़ा पट्टी में कैद है,
- वेस्ट बैंक में बस्तियाँ कब्ज़ाई जा रही हैं,
- लाखों लोग बेघर, भूखे और मज़लूम हैं।
दुनिया की बड़ी ताक़तें खामोश हैं।
अमेरिका खुले तौर पर इज़राइल का साथ देता है।
यूरोप मानवाधिकार की बात करता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त बदलने को कुछ नहीं करता।
जब वही फिलिस्तीनी बच्चे बड़े होकर बदला लेते हैं, तो उन्हें दुनिया “आतंकी” कहती है।
लेकिन असलियत यह है कि वे अपनी जमीन, मस्जिद-ए-अक्सा और अपने वजूद के लिए लड़ रहे हैं।
✍️ निष्कर्ष
👉 सलाउद्दीन अयूबी ने इत्तेहाद से येरूशलम आज़ाद कराया।
👉 सुल्तान अब्दुल हमीद II ने फिलिस्तीन की जमीन बेचने से इनकार किया।
👉 लेकिन ब्रिटिश और ज़ायोनिस्ट साज़िशों ने आज के फिलिस्तीन को मज़लूम बना दिया।
फिलिस्तीन आज भी पूछ रहा है:
क्या दुनिया हमारी तकलीफ़ देख रही है, या बस तमाशा बना हुआ है?
